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सरकार उद्योग नहीं लगाएगी, बस उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाएगी! : रंजीत कुमार

Chief Editor Ranjeet Kumar May 17, 2026 1 मिनट का पाठ
सरकार उद्योग नहीं लगाएगी, बस उद्योगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाएगी! : रंजीत कुमार

अडानी ऐसे नहीं आया है…अडानी को लाया गया है। लोकतंत्र में पूंजी अपने पैरों से कम और सत्ता के कंधों पर ज़्यादा चलती है।

याद कीजिए, जब बेगूसराय में 6 लेन सड़क बन रही थी, तब विकास की भाषा बोली जा रही थी। सड़कें बनती हैं, पुल बनते हैं, निवेश आता है—लेकिन सवाल यह है कि किसके लिए?बिहार पानी से समृद्ध है, जमीन है, श्रमशक्ति है, इतिहास है, कृषि है, युवा हैं…फिर भी हर बार कोई बाहरी उद्योगपति ही बिहार का भविष्य क्यों तय करेगा?जहां-जहां बड़े उद्योगों के चमकदार बोर्ड लगे, वहां के स्थानीय लोग क्या सचमुच समृद्ध हुए?या उनकी जमीन गई, पानी गया, रोजगार ठेके पर गया और मुनाफा किसी कॉर्पोरेट बैलेंस शीट में कैद हो गया?

सवाल अडानी से नहीं है।सवाल उस व्यवस्था से है जो हर समाधान का ठेका किसी एक कॉर्पोरेट को सौंप देना चाहती है।

क्या बिहार अपनी चीनी मिलें खुद नहीं चला सकता?क्या कपड़ा उद्योग का पुनर्जन्म असंभव है?क्या सरकारी औद्योगिक मॉडल अब सिर्फ इतिहास की किताबों के लिए बचा है?क्या बिहार सिर्फ मजदूर पैदा करेगा और मुनाफा कोई दूसरा राज्य ले जाएगा?गुजरात मॉडल का मतलब अगर निजी पूंजी को रेड कार्पेट देना है, तो बिहार मॉडल क्या होगा?घुटनों पर बैठा विकास?

शिक्षा का केंद्र बन सकता था बिहार।कपड़ा उद्योग का हब बन सकता था बिहार।खाद्य प्रसंस्करण में देश का नेतृत्व कर सकता था बिहार।चीनी मिलों के जरिए लाखों परिवारों की अर्थव्यवस्था बदल सकती थी।लेकिन लगता है सरकार ने तय कर लिया है—”बिहार के सपने अब बिहार नहीं, कॉर्पोरेट तय करेंगे।”जनता से कहा जाएगा—निवेश आया है, खुश हो जाइए।जनता पूछेगी—नौकरी किसे मिली? मालिक कौन बना? मुनाफा कहां गया?बिहार झुक रहा है या झुकाया जा रहा है—यही असली बहस है।

Chief Editor Ranjeet Kumar

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