विकास की गंगा बह रही है, फिर पेंशन के लिए आपातकाल क्यों?: Ranjeet Kumar


बिहार सरकार कहती है कि विकास हो रहा है। अर्थव्यवस्था दौड़ रही है। योजनाओं की बाढ़ आई हुई है। विज्ञापनों में बिहार चमक रहा है।लेकिन विधानसभा के दस्तावेज़ में लिखा है कि वृद्ध, विधवा और दिव्यांग पेंशन देने के लिए ₹3662 करोड़ आकस्मिकता निधि से निकालने पड़े।

यानी सरकार का वह पैसा, जो आपातकालीन परिस्थितियों के लिए रखा जाता है, अब नियमित पेंशन भुगतान में इस्तेमाल हो रहा है।अब सवाल पूछिए तो समर्थक कहेंगे—”सब प्रक्रिया का हिस्सा है।”बिल्कुल हो सकता है। लेकिन फिर जनता को यह भी बताइए कि यदि सब कुछ शानदार है तो इमरजेंसी फंड का दरवाज़ा क्यों खटखटाना पड़ा?
चुनाव आते ही हजारों करोड़ की घोषणाएं निकल आती हैं। पोस्टर छप जाते हैं। होर्डिंग लग जाते हैं। विज्ञापन चमकने लगते हैं।लेकिन जब बुजुर्गों की पेंशन की बारी आती है तो आकस्मिकता निधि याद आ जाती है।विकास के दावे इतने ऊँचे हैं कि आसमान छू रहे हैं, लेकिन पेंशन का पैसा निकालने के लिए सरकार को इमरजेंसी जेब में हाथ डालना पड़ रहा है।
सवाल यह नहीं है कि पैसा दिया क्यों गया।सवाल यह है कि क्या बिहार की वित्तीय व्यवस्था इतनी मजबूत है कि अपने सबसे गरीब नागरिकों को नियमित भुगतान कर सके, या फिर पूरा सिस्टम उधार की ऑक्सीजन पर चल रहा है?कल तक कहा जा रहा था कि बिहार देश की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है।तो फिर यह कैसी तरक्की है जिसमें सरकार को वृद्धा पेंशन के लिए भी आकस्मिकता निधि का सहारा लेना पड़ रहा है?
हो सकता है इसके पीछे पूरी तरह तकनीकी कारण हों। हो सकता है बाद में राशि नियमित बजट से समायोजित कर दी जाए। लेकिन जनता को सवाल पूछने से कौन रोक सकता है?क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब खजाना खाली हो जाए।
सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब सवाल पूछना बंद हो जाए और हर वित्तीय निर्णय को उपलब्धि बताकर बेच दिया जाए।
