“बिहार की बेटियाँ कहाँ हैं? यह सिर्फ़ आँकड़ा नहीं, समाज का आईना है।”


बिहार में बेटी के गायब होने की खबर अब खबर नहीं रही। वह अखबार के एक कोने की आदत बन गई है।नेता मंच से कहते हैं—”बेटी बचाओ।”अफसर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहते हैं—”स्थिति नियंत्रण में है।”समाज कहता है—”बदनामी हो जाएगी।”और इसी बीच एक और बेटी गायब हो जाती है।
कभी नौकरी का सपना दिखाकर,कभी शादी का झांसा देकर,कभी गरीबी का फायदा उठाकर,तो कभी हमारी चुप्पी का लाभ उठाकर।हम मंदिरों में कन्या पूजन करते हैं, लेकिन अपने ही मोहल्ले की बेटी तीन दिन से स्कूल नहीं गई, यह जानने की फुर्सत नहीं होती।

बिहार में विकास के बड़े-बड़े दावे होते हैं। एक्सप्रेस-वे गिने जाते हैं, पुल गिने जाते हैं, निवेश गिना जाता है। लेकिन क्या कभी किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह पूछा गया कि इस साल कितनी बेटियाँ गायब हुईं, कितनी मिलीं और कितनी आज भी फाइलों में “लापता” लिखी हैं?यह सिर्फ अपराध नहीं है, यह व्यवस्था की नैतिक विफलता है।
सबसे बड़ा अपराधी सिर्फ तस्कर नहीं है।वह समाज भी है जो चुप रहता है।वह व्यवस्था भी है जो हर मामले को एक और केस नंबर बना देती है।और वह सोच भी है जो कहती है—”थाने मत जाओ, इज्जत चली जाएगी।”इज्जत एफआईआर से नहीं जाती,इज्जत तब जाती है जब एक माँ अपनी बेटी की तस्वीर लेकर दर-दर भटकती है और व्यवस्था उसे सिर्फ आश्वासन देती है।
अगर किसी जिले से हर साल हजारों लोग लापता हों, तो यह सिर्फ पुलिस की रिपोर्ट नहीं, सरकार की रिपोर्ट कार्ड भी है।सवाल यह नहीं कि बिहार की बेटियाँ कहाँ जा रही हैं।सवाल यह है कि वे किसकी लापरवाही में खो रही हैं?जिस दिन समाज बेटी के गायब होने पर उतना ही शोर मचाएगा जितना जाति, धर्म और चुनाव पर मचाता है, उसी दिन बदलाव शुरू होगा।तब तक पोस्टर छपते रहेंगे। और किसी माँ की आँखें दरवाजे पर टिकी रहेंगी।
