“जब कानून कमजोर पड़ता है, तब गोली को न्याय बताया जाता है।”: Ranjeet Kumar


पहले गोली चलाइए, फिर प्रेस नोट जारी कर दीजिए। सवाल पूछने वाला अगर बच गया तो उसे अपराधी बता दीजिए, और अगर मर गया तो फाइल बंद कर दीजिए।
आरा की सड़क पर रखे उस शव ने शायद सरकारी स्क्रिप्ट पढ़ने से इंकार कर दिया। इसलिए लोग सड़क पर उतर आए। गांव वाले, परिजन, महिलाएं, बच्चे—सब पूछने लगे कि आखिर हुआ क्या?अब लोकतंत्र में जनता सवाल पूछे, यह भी एक समस्या है। इसलिए पुलिस पहुँची। फिर लाठी पहुँची। फिर व्यवस्था पहुँची। क्योंकि हमारे यहाँ अक्सर सवाल का जवाब नहीं दिया जाता, सवाल पूछने वालों को हटाया जाता है।
अजीब दौर है। जब तक कोई जिंदा रहता है, उसकी बात कोई नहीं सुनता। मरने के बाद उसकी लाश के आसपास पूरी व्यवस्था जमा हो जाती है।अगर एनकाउंटर इतना ही साफ और पारदर्शी था, तो फिर सड़क पर इतना गुस्सा क्यों है? लोग शव लेकर घंटों क्यों बैठे हैं? पुलिस को लाठी क्यों चलानी पड़ रही है?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि कभी-कभी सरकार जनता को समझाने के बजाय उसे नियंत्रित करने लगती है।और फिर हमसे कहा जाता है कि सब कुछ सामान्य है।सवाल यह नहीं है कि भरत तिवारी कौन था। सवाल यह है कि कानून बड़ा है या गोली?क्योंकि जिस दिन इस सवाल का जवाब गोली बन जाएगी, उस दिन संविधान सिर्फ किताब में रह जाएगा।
