क्रांति की रील बन गई, अब राजनीति की रियलिटी बाकी है : Ranjeet Kumar


दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों युवा प्रदर्शन कर रहे हैं। हाथों में तख्तियां हैं, नारों में गुस्सा है और सोशल मीडिया पर समर्थन की सुनामी है। कॉकरोच जनता पार्टी ने रातों-रात वह चर्चा हासिल कर ली है जिसके लिए कई राजनीतिक दल वर्षों तक संघर्ष करते हैं।लेकिन राजनीति की सड़क, ट्विटर की टाइमलाइन से कहीं अधिक लंबी होती है।

भारत में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा कि सोशल मीडिया से कोई आंदोलन या राजनीतिक समूह उभरा हो। फर्क सिर्फ इतना है कि हर पीढ़ी को लगता है कि इस बार इतिहास अलग लिखा जाएगा।युवाओं का गुस्सा असली है। पेपर लीक असली है। बेरोज़गारी असली है। व्यवस्था से नाराज़गी भी असली है। लेकिन राजनीति में सिर्फ गुस्सा पर्याप्त नहीं होता।जंतर-मंतर पर हजारों लोग खड़े हो सकते हैं, लेकिन चुनाव के दिन लाखों बूथों पर कौन खड़ा होगा?

सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर मिल सकते हैं, लेकिन क्या वही लोग गर्मी, बारिश और सर्दी में संगठन खड़ा करेंगे?यही वह सवाल है जिससे हर इंटरनेट क्रांति टकराती है।
दिल्ली के कुछ राजनीतिक जानकार कहते हैं कि सत्ता विरोध से नहीं डरती, सत्ता संगठन से डरती है। विरोध एक दिन का हो सकता है, संगठन कई पीढ़ियों का होता है।इस देश में ऐसे भी नेता हुए जिनके एक ट्वीट पर लाखों लाइक आते थे, लेकिन चुनाव में जमानत बचाना मुश्किल हो गया। क्योंकि लोकतंत्र में लाइक का बटन और वोट का बटन एक ही मशीन में नहीं होता।

कॉकरोच जनता पार्टी के सामने असली चुनौती भाजपा, कांग्रेस या किसी दूसरी पार्टी से नहीं है। असली चुनौती यह है कि वह खुद को एक ट्रेंड से राजनीतिक ताकत में बदल पाए क्योंकि भारतीय राजनीति बहुत निर्दयी है।वह मंच पर भाषण देने वाले को नहीं, बूथ पर डटे रहने वाले को पहचानती है।वह फॉलोअर नहीं गिनती, वोट गिनती है।वह वायरल वीडियो नहीं देखती, मतदान प्रतिशत देखती है।
राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि इंटरनेट पर क्रांति करने वाले लाखों लोग भी मतदान के दिन घर में बैठकर रील देख रहे होते हैं।इसलिए जंतर-मंतर की भीड़ महत्वपूर्ण है, युवाओं का गुस्सा भी महत्वपूर्ण है, लेकिन राजनीति का फैसला कैमरे के सामने नहीं, मतपेटी के सामने होता है।बाकी, भारत की राजनीति में रोज़ एक नया सूरज उगता है। असली परीक्षा यह होती है कि तीन महीने बाद भी उसकी रोशनी बची रहती है या नहीं।
