“वोट की कीमत एक दिन, टोल की कीमत हर दिन!”


चुनाव का मौसम बड़ा सुहाना होता है। नेता कहते हैं—”आपका बेटा हूं, आपकी सेवा करूंगा।” जनता मुस्कुराती है, हाथ मिलाती है, उम्मीदें पाल लेती है। फिर चुनाव खत्म होता है और वही जनता सड़क पर निकलती है तो पता चलता है कि सेवा का पहला बिल आ गया है—प्रति किलोमीटर 1.25 रुपये।
लोकतंत्र भी अजीब चीज है। वोट देने के लिए कोई शुल्क नहीं लगता, लेकिन वोट देने के बाद सड़क पर चलने का हिसाब शुरू हो जाता है।चुनाव के समय घोषणाओं की बारिश होती है। कहीं नकद सहायता के वादे, कहीं मुफ्त सुविधाओं के दावे, कहीं विकास के सपने। जनता सोचती है कि शायद अब जीवन आसान होगा। लेकिन कुछ महीनों बाद उसे एहसास होता है कि सरकार का कैलकुलेटर उससे कहीं तेज चलता है। जेब से निकलने वाला हर रुपया गिना जाता है।
सरकार कहती है—टोल से सड़कें बेहतर होंगी। जनता पूछती है—जो टैक्स अब तक दिया, उसका हिसाब कौन देगा? पेट्रोल पर टैक्स, गाड़ी खरीदने पर टैक्स, रजिस्ट्रेशन, बीमा, फिटनेस… और अब सड़क पर चलने का अलग शुल्क। नागरिक पूछता है—क्या मैं सड़क का मालिक हूं या किरायेदार?

विडंबना यह है कि चुनाव में जनता सबसे ताकतवर होती है, लेकिन चुनाव के बाद सबसे बड़ी भुगतानकर्ता भी वही बन जाती है।यह लेख टोल का विरोध नहीं है। अगर सड़क विश्वस्तरीय हो, पुल सुरक्षित हों, समय बचे और व्यवस्था पारदर्शी हो, तो लोग भुगतान भी करेंगे। लेकिन लोकतंत्र में जनता सिर्फ रसीद नहीं, जवाबदेही भी चाहती है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी सड़क जनता के विश्वास से बनती है। यदि वह सड़क टूट गई, तो कोई टोल प्लाज़ा उसे नहीं जोड़ सकता।
