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माता जी, निवेश चाहिए या सस्ता राशन?”उत्तर में पूरा अर्थशास्त्र मिल जाएगा : रंजीत कुमार

सम्राट चौधरी कह रहे हैं—“5 लाख करोड़ का निवेश आएगा… लोग बिहार लौट रहे हैं…”यह सुनकर बिहार के गांव की एक महिला शायद मुस्कुराई होगी।फिर उसने खाली तेल का डिब्बा देखा होगा।और मुस्कान अपने आप खत्म हो गई होगी।क्योंकि बिहार में निवेश का सपना टीवी पर आता है,महंगाई सीधे रसोई में घुसती है।

गांव का आदमी CPI नहीं समझता।वह सिर्फ इतना समझता है—दाल फिर महंगी हो गई।तेल फिर महंगा हो गया।बच्चे की कॉपी फिर महंगी।दवा भी महंगी।सरकार कह रही है—“5 लाख करोड़।”जनता पूछ रही है—“5 किलो आटा सस्ता कब होगा?”यही लोकतंत्र का सबसे ईमानदार सवाल है।

बिहार की राजनीति में एक पुरानी बीमारी है—भविष्य बेचो, वर्तमान भूल जाओ।आज महंगाई है?कोई बात नहीं।कल निवेश आएगा।आज रोजगार नहीं?कोई बात नहीं।कल उद्योग आएगा।आज युवा दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड है?कोई बात नहीं।कल बिहार सिलिकॉन वैली बनेगा।बिहार में “कल” बहुत शक्तिशाली शब्द है।इतना शक्तिशाली कि “आज” को खा जाता है।

सम्राट चौधरी कहते हैं—लोग लौट रहे हैं।हां, लौट रहे हैं।लेकिन विकास देखकर नहीं, मजबूरी देखकर।कोई फैक्ट्री की नौकरी छोड़कर नहीं लौट रहा।कई लोग इसलिए लौटते हैं क्योंकि दिल्ली का किराया जेब काट देता है, पंजाब में काम खत्म हो जाता है, मुंबई कमरे से बाहर फेंक देती है।और बिहार आते ही उन्हें बताया जाता है—“5 लाख करोड़ आने वाला है।”कमाल है।

जिस बिहार के लाखों युवा दूसरे राज्यों की अर्थव्यवस्था चलाते हैं,उन्हें अपने राज्य में सपना सुनाया जाता है।यह ऐसा है जैसे भूखे आदमी को मेन्यू कार्ड दिखाकर कहा जाए—“देखिए, भविष्य स्वादिष्ट है।”ग्रामीण महंगाई बढ़ रही है।इसका मतलब गांव का आदमी अब और महंगा जिएगा।डीजल महंगा तो खेती महंगी।खेती महंगी तो अनाज महंगा।अनाज महंगा तो रसोई महंगी।रसोई महंगी तो घर में तनाव महंगा।लेकिन नेता का भाषण अब भी मुफ्त है।बिहार में हर चुनाव से पहले उद्योग आता है।पोस्टर पर।भाषण में।घोषणाओं में।चुनाव के बाद उद्योग गायब हो जाता है,लेकिन बेरोजगारी वहीं खड़ी रहती है—स्थायी कर्मचारी की तरह।

और सबसे दिलचस्प बात—जो नेता 5 लाख करोड़ की बात कर रहा है,उसी बिहार का युवा नौकरी के फॉर्म भरते-भरते बूढ़ा हो रहा है।गांव का किसान बैंक के कर्ज से डरता है।छोटा दुकानदार EMI से डरता है।मरीज अस्पताल के बिल से डरता है।लेकिन सरकार निवेश के अंकगणित में व्यस्त है।

जनता पेट के हिसाब से सोचती है।सरकार प्रेस कॉन्फ्रेंस के हिसाब से।सवाल सिर्फ इतना है—अगर बिहार इतना ही बदल गया है, तो फिर बिहार का युवा आज भी टिकट लेकर बाहर क्यों जाता है, टिकट काटकर वापस क्यों नहीं आता?5 लाख करोड़ आने से पहले,किसी गांव की रसोई में जाकर पूछिए—“माता जी, निवेश चाहिए या सस्ता राशन?”उत्तर में पूरा अर्थशास्त्र मिल जाएगा।

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Chief Editor Ranjeet Kumar

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