
नवादा के केसरिया गांव में पुलिस कहती है—अवैध बालू खनन था। ट्रैक्टर चालक ने ASI नागेंद्र कुमार को टक्कर मारी। यह गंभीर अपराध है। जिसने किया, उसे कानून के सामने आना चाहिए।
लेकिन उसके बाद क्या हुआ?
देसी तंत्र के जमीनी पत्रकार सुजीत यादव दावा कर रहे हैं कि आरोपी की तलाश के नाम पर पूरे गांव पर लाठी बरसी। लोग घर छोड़कर भागे। बुजुर्ग डरे हुए हैं। गांव में खौफ है।
अब सवाल यह है—क्या बिहार में कानून का मतलब यही है कि एक आदमी अपराध करे और पूरा गांव सजा पाए?अगर 6 लोग पकड़े गए, तो बाकी गांव किस अपराध में दोषी था?क्या नवादा का केसरिया कोई आतंकवादी कैंप था?क्या हर घर में बालू माफिया बैठा था?क्या हर बच्चा, हर बुजुर्ग, हर महिला आरोपी थी?या फिर गरीब गांवों के लिए कानून की भाषा अलग होती है?
अमीरों के यहां नोटिस जाता है।गरीबों के यहां लाठी जाती है।यह पुराना भारतीय मॉडल है।कानून कहता है—दोषी को पकड़ो।व्यवस्था कभी-कभी कहती है—डर ऐसा फैलाओ कि अगली बार कोई सवाल न पूछे।घायल ASI के लिए न्याय होना चाहिए।लेकिन न्याय का मतलब प्रतिशोध नहीं होता।
लोकतंत्र में पुलिस को अधिकार है।लेकिन अधिकार और कहर में फर्क होता है।पूर्व विधायक कौशल यादव कहते हैं कि पूरे गांव के साथ अन्याय हुआ है। यह सच है, मामला सिर्फ बालू खनन का नहीं है।मामला राज्य के चरित्र का है।क्योंकि अगर आरोपी की तलाश में पूरा गांव दुश्मन बना दिया जाए, तो फिर कल किसी भी गांव की बारी हो सकती है।
पत्रकार सुजीत यादव बताते हैं कि गांव के लोगों में पुलिस का गहरा भय है। यह कोई जम्मू-कश्मीर नहीं, बल्कि बिहार का नवादा है।पत्रकार का कहना है कि पुलिस कहती है न्याय होगा, लेकिन असली सवाल न्याय के चरित्र और जनता के विश्वास का है।