“एक बच्चों का भविष्य बेच रहा है, दूसरा लोकतंत्र का विवेक!” : Ranjeet Kumar


आजकल देश में दो नए विश्वविद्यालय चल रहे हैं।एक है यूट्यूब विश्वविद्यालय, जहां हर दूसरा आदमी शिक्षक है।
दूसरा है टीवी डिबेट विश्वविद्यालय, जहां हर तीसरा आदमी राष्ट्र का ठेकेदार है।पहले विश्वविद्यालय में शिक्षक बताते हैं कि IAS कैसे बनना है, करोड़पति कैसे बनना है, छह महीने में अंग्रेजी कैसे सीखनी है, और सात दिन में जिंदगी कैसे बदलनी है।
दूसरे विश्वविद्यालय में एंकर बताते हैं कि देश कैसे चल रहा है, जनता को क्या सोचना चाहिए, कौन देशभक्त है और कौन संदिग्ध है।फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वाले के पास व्हाइटबोर्ड है, दूसरे वाले के पास स्टूडियो।यूट्यूब शिक्षकों ने शिक्षा को गांव-गांव तक पहुंचाया। गरीब छात्र, जो कभी बड़े शहरों की कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते थे, उन्हें पढ़ने का मौका मिला। यह एक सकारात्मक बदलाव था।लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा भी बाजार बन गई।अब पढ़ाई कम, मार्केटिंग ज्यादा है।वीडियो के बीच में विज्ञापन, थंबनेल में चमत्कार, और हर दूसरे दिन “सफलता का शॉर्टकट”।ज्ञान का स्थान कई बार पैकेजिंग ने ले लिया।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पत्रकारिता दूध से धुली हुई है।वहां भी एक अलग कारोबार चल रहा है।जहां खबर कम और नाटक ज्यादा है।जहां तथ्य कम और उत्तेजना ज्यादा है।जहां जनता की समस्या कम और सत्ता की प्रशंसा ज्यादा है।जब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सत्ता से सवाल पूछने के बजाय सत्ता की उपलब्धियों का उद्घोषक बन जाए, तब पत्रकारिता और जनसंपर्क के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
सवाल यह है कि आज की बहुचर्चित टीवी डिबेट आखिर है क्या?क्या यह पत्रकारिता है?क्या यह सूचना है?क्या यह विश्लेषण है?या फिर सिर्फ एक प्राइम टाइम तमाशा?टीवी स्क्रीन पर दस खिड़कियां खुलती हैं।एक साथ दस लोग चिल्लाते हैं।किसी को सुनना नहीं है।किसी को समझना नहीं है।बस बोलना है।जोर से बोलना है।और इतना बोलना है कि दर्शक को लगे कि कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय काम हो रहा है।मजेदार बात यह है कि जिन मुद्दों पर महीनों की पड़ताल होनी चाहिए, वहां पांच मिनट की बहस होती है।और जिन सवालों पर सरकार से जवाब मांगा जाना चाहिए, वहां विपक्ष और प्रवक्ताओं की कुश्ती दिखाई जाती है।कभी-कभी लगता है कि न्यूजरूम नहीं, कुश्ती का अखाड़ा चल रहा है।लोकतंत्र में बहस जरूरी है।लेकिन बहस और शोर में फर्क होता है।तर्क और चिल्लाहट में फर्क होता है।सूचना और उत्तेजना में फर्क होता है।अदालत इसलिए बनी कि तथ्य और सबूत के आधार पर बात हो।संसद इसलिए बनी कि नीतियों पर चर्चा हो।पत्रकारिता इसलिए बनी कि सत्ता से सवाल पूछे जाएं।लेकिन अगर हर जगह सिर्फ शोर रह जाए, तो फिर सच की आवाज़ कहां सुनी जाएगी?

समस्या यूट्यूब शिक्षक में भी है।समस्या टीवी एंकर में भी है।एक तरफ ज्ञान का बाज़ार है।दूसरी तरफ खबरों का मनोरंजन।एक तरफ छात्र ग्राहक बन गया है।दूसरी तरफ दर्शक उपभोक्ता बन गया है।और दोनों जगह सबसे बड़ा नुकसान उस आम आदमी का है जो जानकारी चाहता है, सच चाहता है, और अपने जीवन से जुड़े सवालों का जवाब चाहता है।लोकतंत्र तब मजबूत नहीं होता
जब स्टूडियो में लोग एक-दूसरे पर चिल्लाएं।लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब पत्रकार जनता की तरफ खड़ा होकर सत्ता से पूछे—”जनाब, जनता के सवाल का जवाब कब देंगे?”क्योंकि शोर हमेशा सत्ता का मित्र होता है।और सवाल हमेशा लोकतंत्र का।
