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“19,838 की भर्ती में 50 हजार सफल! बिहार पुलिस भर्ती है या कोचिंग वालों का चमत्कार?”: Ranjeet Kumar

बिहार पुलिस कांस्टेबल भर्ती में कुल 19,838 अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। यह सरकारी आंकड़ा है। लेकिन अगर कोचिंग संस्थानों के पोस्टर, बैनर और सोशल मीडिया के दावे पढ़ लीजिए, तो लगेगा कि भर्ती बिहार पुलिस ने नहीं, कोचिंग उद्योग ने कराई है।

कोई कह रहा है मेरे 10 हजार बच्चे पास हुए।कोई कह रहा है मेरे 12 हजार बच्चे पास हुए।कोई 5 हजार का दावा कर रहा है।कोई 2 हजार का।कोई 1 हजार का।

इन दावों को जोड़िए तो चयनित अभ्यर्थियों की संख्या भर्ती से कई गुना अधिक निकलती है।गणित कोने में बैठकर सिर पकड़ चुका है और मार्केटिंग ढोल बजाकर नाच रही है।

अब सवाल यह है कि आखिर ये “मेरे बच्चे” कौन हैं?क्या वे नियमित छात्र थे?क्या उन्होंने फीस जमा की थी?क्या वे सिर्फ यूट्यूब देखने वाले दर्शक थे?क्या उन्होंने एक बार फ्री क्लास अटेंड की थी?या फिर सफलता की खबर आने के बाद उन्हें पोस्टर पर चिपका दिया गया?

आज शिक्षा कम और श्रेय लूटने की प्रतियोगिता ज्यादा दिखाई देती है।जिस छात्र ने वर्षों तक संघर्ष किया, रातें जागकर पढ़ा, आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया, परिवार का दबाव झेला, असफलताओं को सहा—उसकी मेहनत पर सबसे पहले दावा कोचिंग उद्योग ठोक देता है।छात्र का चयन होते ही उस पर कई “गुरुओं” का मालिकाना हक़ शुरू हो जाता है।ऐसा लगता है जैसे छात्र नहीं, कोई जमीन का प्लॉट हो जिस पर हर कोई अपना दावा दर्ज करा रहा हो।दुर्भाग्य यह है कि इस खेल में मीडिया का एक हिस्सा भी शामिल हो जाता है। विज्ञापन को उपलब्धि और दावा को सत्य बनाकर परोसा जाता है। कोई यह नहीं पूछता कि जिन हजारों सफल छात्रों का दावा किया जा रहा है, उनकी प्रमाणित सूची कहाँ है?अगर किसी पत्रकार ने यह पूछ लिया कि “नाम बताइए, रोल नंबर बताइए, सूची दिखाइए”, तो उसे विरोधी घोषित कर दिया जाएगा।

शिक्षा के नाम पर एक ऐसा बाजार खड़ा हो गया है जहाँ सत्यापन नहीं, ब्रांडिंग चलती है।और सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब छात्र का होता है जो इन पोस्टरों को देखकर यह मान बैठता है कि सफलता मेहनत से नहीं, किसी विशेष कोचिंग के दरवाजे से मिलती है।

सच्चाई यह है कि किसी भी परीक्षा में सबसे बड़ा शिक्षक परिश्रम होता है।कोचिंग मार्ग दिखा सकती है, लेकिन मंजिल तक पैर छात्र के ही चलते हैं।

इसलिए अब समय आ गया है कि कोचिंग संस्थानों के दावों का भी सामाजिक ऑडिट हो।क्योंकि अगर हर सफल अभ्यर्थी किसी न किसी कोचिंग का छात्र है, तो फिर बिहार में असफल कौन हुआ?और अगर हर कोचिंग सच बोल रही है, तो बिहार पुलिस को अपनी चयन सूची दोबारा जारी करनी चाहिए।हो सकता है वास्तविक भर्ती 19,838 नहीं, पोस्टरों में 50 हजार पार कर चुकी हो।और जिस रफ्तार से दावे बढ़ रहे हैं, अगली बार शायद बिहार की आबादी से भी ज्यादा चयनित छात्र किसी न किसी कोचिंग के निकल आएँ!

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Chief Editor Ranjeet Kumar

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