गांव का डॉक्टर पूछ रहा है: मेरे हिस्से में क्या आया? : Ranjeet Kumar


लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन की सफलता उसके पोस्टर, मंच और भीड़ से नहीं मापी जाती। उसकी सफलता इस बात से मापी जाती है कि जिन लोगों के नाम पर आंदोलन खड़ा हुआ, उनकी जिंदगी में कितना बदलाव आया।ग्रामीण चिकित्सकों का सवाल भी कुछ ऐसा ही है

बिहार के हजारों गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली कड़ी वही ग्रामीण चिकित्सक हैं, जिन्हें सरकार कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं करती और समाज पूरी तरह नकार भी नहीं पाता। गांव में किसी की तबीयत बिगड़ती है तो सबसे पहले सरकारी अस्पताल नहीं, ग्रामीण चिकित्सक का दरवाजा खटखटाया जाता है।लेकिन विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति पर गांव भरोसा करता है, उसकी अपनी जिंदगी असुरक्षा और अनिश्चितता में गुजरती है।
वर्षों से ग्रामीण चिकित्सकों के नाम पर सम्मेलन हो रहे हैं। संगठन बन रहे हैं। सदस्यता अभियान चल रहे हैं। पहचान पत्र बांटे जा रहे हैं। नेताओं के साथ तस्वीरें खिंच रही हैं। बड़े-बड़े मंच सज रहे हैं और अधिकारों की लड़ाई के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं।लेकिन एक असहज सवाल लगातार खड़ा है।इन सब वर्षों के बाद ग्रामीण चिकित्सकों को मिला क्या?क्या उन्हें कानूनी सुरक्षा मिली?क्या उन्हें स्पष्ट कार्यक्षेत्र मिला?क्या उन्हें सामाजिक सम्मान मिला?क्या उन्हें किसी प्रकार का संस्थागत संरक्षण मिला?
अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतने वर्षों की गतिविधियों का परिणाम क्या रहा?लोकतंत्र में किसी संगठन या आंदोलन से सवाल पूछना उसका विरोध नहीं होता। बल्कि वही सवाल उसकी विश्वसनीयता की परीक्षा लेते हैं।
यदि ग्रामीण चिकित्सकों के नाम पर सदस्यता शुल्क, पहचान पत्र शुल्क, सम्मेलन शुल्क, सहयोग राशि या अन्य आर्थिक योगदान लिए गए हैं, तो उन पैसों का पारदर्शी सार्वजनिक लेखा-जोखा भी सामने आना चाहिए। क्योंकि किसी भी जनआंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास होती है और विश्वास की सबसे बड़ी शर्त होती है—पारदर्शिता।आज गांव का चिकित्सक सिर्फ नारे नहीं सुनना चाहता।वह जानना चाहता है कि उसके भविष्य के लिए अब तक क्या ठोस उपलब्धि हासिल हुई है।वह जानना चाहता है कि उसके नाम पर चलने वाली लड़ाई में उसका हिस्सा क्या है और परिणाम क्या है।सवाल इसलिए नहीं उठ रहे कि लोग आंदोलन को कमजोर करना चाहते हैं।सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि लोग आंदोलन को परिणाम तक पहुंचते देखना चाहते हैं।ग्रामीण चिकित्सकों को सबसे ज्यादा जरूरत किसी नए सम्मेलन की नहीं है।
उन्हें जरूरत है नीति की।उन्हें जरूरत है सुरक्षा की।उन्हें जरूरत है सम्मान की।और सबसे बढ़कर उन्हें जरूरत है जवाबदेही की।क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ताकतवर नारा नहीं, बल्कि सबसे ताकतवर शब्द है—हिसाब।

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