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इंसाफ अदालत में होगा… या सड़क पर?कानून चलेगा… या गोली?: रंजीत कुमार

भागलपुर में एक अफसर की हत्या होती है।हत्या के 12 घंटे के भीतर—एक “कुख्यात” अपराधी का एनकाउंटर हो जाता है।नाम—रामधनी यादव।

पुलिस कहती है—“पहले फायरिंग उसी ने की… जवाब में गोली चली।”परिवार कहता है—“वो तो सरेंडर करने गया था…”अब आप तय कीजिए—सच किसके पास है?

“खबर सिर्फ सूचना नहीं होती, सवाल भी होती है।”तो सवाल यही है—क्या 12 घंटे में न्याय हो गया?या 12 घंटे में एक कहानी तैयार हो गई?

आजकल “एनकाउंटर” एक शब्द नहीं,एक पॉलिटिकल मॉडल बन चुका है।जिसे कुछ लोग “सख्त कार्रवाई” कहते हैं,और कुछ लोग—“कानून का शॉर्टकट”।क्योंकि अदालत में केस चलता है—सालों-साल।सबूत जुटते हैं, गवाह आते हैं, बहस होती है।लेकिन एनकाउंटर में—ना गवाह, ना जिरह,बस एक अंतिम फैसला।

यहाँ एक और सवाल है—अगर कोई सच में सरेंडर करने आया था,तो गोली क्यों चली?और अगर सच में उसने फायरिंग की,तो क्या हर आरोपी का अंत इसी तरह होना चाहिए?समस्या सिर्फ एक केस की नहीं है।समस्या उस सोच की है—जहाँ कानून पर भरोसा कम और गोली पर भरोसा ज्यादा होता जा रहा है।

टीवी स्टूडियो में बैठकर,या सोशल मीडिया पर लिखते हुए,एनकाउंटर पर तालियां बजाना आसान है।लेकिन याद रखिए—जब कानून कमजोर होता है,तो उसका निशाना सिर्फ अपराधी नहीं होता…कभी-कभी निर्दोष भी होता है।

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Chief Editor Ranjeet Kumar

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