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डिग्री हाथ में, बेरोजगारी सिर पर… और उपाधि मिली—कॉकरोच! : रंजीत कुमार

लोकतंत्र बड़ा दिलचस्प जीव है।किताबों में पढ़ाया जाता है—“जनता मालिक है।”जमीन पर समझाया जाता है—“ज्यादा सवाल मत पूछो।”यानी वोट डालते समय आप मालिक हैं।और वोट डालने के बाद… शायद कॉकरोच।

यह नया भारत है।यहां बेरोजगार युवा नौकरी मांगे तो कहा जाएगा—धैर्य रखो।परीक्षा लीक हो जाए तो कहा जाएगा—सिस्टम सुधार रहे हैं।अस्पताल में डॉक्टर न मिले तो कहा जाएगा—योजना आ रही है।RTI लगाओ तो फाइल घूमेगी, अफसर घूमाएंगे, जवाब कहीं छुट्टी पर चला जाएगा।लेकिन अगर इन सब पर सवाल पूछ लिया—तो समस्या व्यवस्था नहीं, आप बन जाएंगे।कमाल है।डिग्री आपने ली।फॉर्म आपने भरा।फीस आपने दी।साल आपने गंवाए।बेरोजगारी आपने झेली।और चरित्र प्रमाणपत्र व्यवस्था देगी—“देखिए, यही है कॉकरोच प्रजाति।

”वैसे विज्ञान कहता है कॉकरोच गंदगी में पनपते हैं।तो लोकतंत्र में अगर कॉकरोच दिख रहे हैं, तो सवाल नागरिक से नहीं, नाली के इंजीनियरों से पूछिए।किसने ऐसा सिस्टम बनाया जहां नौकरी विज्ञापन से ज्यादा पेपर लीक नियमित है?किसने ऐसा लोकतंत्र बनाया जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल तय होते हैं और जनता के सवाल असभ्यता?किसने ऐसा माहौल बनाया जहां युवा LinkedIn से ज्यादा मीम पेज पर भविष्य खोज रहा है?लेकिन नहीं।ये सवाल मत पूछिए।सवाल पूछना सिस्टम को एलर्जी देता है।

सिस्टम चाहता क्या है?ताली बजाइए।हैशटैग चलाइए।फोटो बदलिए।भावुक हो जाइए।बस हिसाब मत मांगिए।लोकतंत्र का नया यूजर मैनुअल यही लगता है।अजीब बात है।चुनाव के समय यही नागरिक “देश का भविष्य” होता है।चुनाव के बाद यही नागरिक “नकारात्मक तत्व” हो जाता है।और अगर थोड़ा व्यंग्य कर दे तो “कॉकरोच” अपग्रेड मिल जाता है।यानी रोजगार नहीं मिला, पर उपाधि मिल गई।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि सवाल पूछे जा रहे हैं।त्रासदी यह है कि जवाब देने की जगह उपमा दी जा रही है।क्योंकि जवाब देना मेहनत मांगता है।उपमा देना अहंकार।और इस समय अहंकार सस्ता है, जवाब महंगा।तो अगली बार जब कोई कहे कि सवाल पूछने वाले कॉकरोच हैं

—बस एक विनम्र सवाल पूछिए:“हुजूर, अगर हम कॉकरोच हैं… तो यह गंदगी किसकी बनाई हुई है?”

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Chief Editor Ranjeet Kumar

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