खान बनाम आनंद:”दो हाथी लड़ेंगे तो जंगल उन्हीं को देखेगा, हिरणों को नहीं”- Ranjeet Kumar


पटना के मुसल्लहपुर हाट से लेकर बिहार के छोटे-छोटे कस्बों तक एक सवाल हवा में तैरता रहता है
—”खान सर बड़े या रौशन आनंद?”ऐसा लगता है जैसे बिहार की शिक्षा व्यवस्था का भविष्य इसी सवाल पर टिका हो।
एक तरफ दावा है कि “मेरे 10 हजार बच्चे पास हुए”, दूसरी तरफ घोषणा है कि “मेरे 12 हजार बच्चे सफल हुए”। छात्र बेचारा सोच रहा है कि अगर दोनों के दावों को जोड़ दिया जाए तो बिहार की हर भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों से ज्यादा सफल छात्र पैदा हो चुके हैं।
सवाल यह नहीं है कि खान बड़े हैं या रौशन आनंद बड़े हैं।सवाल यह है कि बड़ा किस पैमाने से?यूट्यूब सब्सक्राइबर से?भीड़ से?फीस से?पोस्टर से?या फिर वास्तविक चयनित अभ्यर्थियों से?

यहीं से कहानी शुरू होती है।कोचिंग उद्योग में रिज़ल्ट अब शिक्षा का नहीं, मार्केटिंग का उत्पाद बन चुका है। एक सफल छात्र यदि पांच कोचिंग की टेस्ट सीरीज देता है, तीन जगह क्लास करता है और दो जगह इंटरव्यू देता है, तो चयन होने के बाद छह संस्थान उसका फोटो अपने पोस्टर पर लगा देते हैं।फिर छात्र का चयन नहीं होता, बल्कि पोस्टर का चयन होता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज तक किसी सरकारी एजेंसी ने यह सार्वजनिक नहीं किया कि किस कोचिंग के दावे कितने सत्य हैं। न कोई स्वतंत्र ऑडिट, न कोई सत्यापन प्रणाली, न कोई शिक्षा आयोग की जांच।यानी—रिज़ल्ट भी स्वयं घोषित, सफलता भी स्वयं प्रमाणित और महानता भी स्वयं घोषित।यही कारण है कि छात्र हमेशा कन्फ्यूजन में रहता है।उसे बताया जाता है कि अगर खान सर नहीं पढ़ेंगे तो नौकरी नहीं मिलेगी।दूसरी तरफ कहा जाता है कि अगर ज्ञान बिंदु नहीं गए तो चयन असंभव है।लेकिन कोई यह नहीं बताता कि हजारों छात्र ऐसे भी हैं जिन्होंने किसी बड़े संस्थान का दरवाजा तक नहीं देखा और फिर भी नौकरी पा ली।
असलियत यह है कि कोचिंग उद्योग का सबसे बड़ा डर दूसरा कोचिंग नहीं है।सबसे बड़ा डर है—छात्र का यह समझ जाना कि सफलता का असली मालिक वही है।यहीं विवाद की राजनीति शुरू होती है।जब भी दो बड़े संस्थानों के बीच तनातनी होती है, पूरा सोशल मीडिया उसी में उलझ जाता है। तीसरे, चौथे, पांचवें संस्थान का नाम गायब हो जाता है।
बाजार का पुराना नियम है—दो हाथी लड़ेंगे तो जंगल उन्हीं को देखेगा, हिरणों को नहीं।इसलिए कई लोगों को लगता है कि विवाद भी कभी-कभी मार्केटिंग मॉडल बन जाता है।एक पक्ष बोलेगा। दूसरा जवाब देगा। यूट्यूब चलेगा। रील बनेगी। समर्थक लड़ेंगे। और एडमिशन फॉर्म भरते रहेंगे।
इस बीच छात्र यह भूल जाएगा कि उसने कोचिंग में प्रवेश नौकरी पाने के लिए लिया था, किसी शिक्षक की सेना में भर्ती होने के लिए नहीं।हाल के दिनों में खान सर के संस्थान को लेकर विवाद और सुरक्षा संबंधी घटनाएं भी सामने आई हैं, जिनमें प्रतिद्वंद्वी संस्थानों पर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की जांच पुलिस कर रही है और अभी तक किसी निष्कर्ष की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है
अंत में सवाल वही है—बिहार में सबसे बड़ा कोचिंग कौन है?शायद इसका जवाब न खान के पास है, न आनंद के पास।इसका जवाब उस छात्र के पास है जो रात के दो बजे तक पढ़ता है, पुरानी किताब खरीदता है, किराया बचाकर नोट्स बनाता है और रिज़ल्ट आने के बाद किसी पोस्टर में नहीं दिखता।क्योंकि सच यह है—कोचिंग सफलता बेचती है, लेकिन सफलता पैदा अब भी छात्र की मेहनत ही करती है।
