मुख्यमंत्री का नया बिहार, गांव पूछ रहा—हमारा नंबर कब? : Ranjeet Kumar


लोक सेवक आवास के संकल्प सभागार में बैठक हुई। अधिकारी बैठे, प्रेजेंटेशन चला, स्क्रीन चमकी और बिहार के शहरी विकास का एक नया सपना फिर से जनता के सामने परोसा गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 11 सैटेलाइट टाउन बनेंगे, रोजगार आएगा, आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी और बिहार का शहरीकरण नई ऊंचाई छुएगा।सवाल यह नहीं है कि सैटेलाइट टाउन बनेंगे या नहीं।सवाल यह है कि बिहार में कितनी योजनाएं ऐसी हैं जो कागज से निकलकर जमीन तक पहुंची हैं?
बिहार का नागरिक अब इतना अनुभवी हो चुका है कि “भूमि अधिग्रहण”, “स्वीकृति प्रक्रिया”, “समय-सीमा” और “निर्देश दिया गया” जैसे शब्द सुनते ही समझ जाता है कि अभी कहानी की शुरुआत हुई है, अंत नहीं।
मुख्यमंत्री अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं कि बाधाएं दूर कीजिए। लेकिन जनता पूछ रही है कि जिन बाधाओं ने दशकों से उद्योग रोके, अस्पताल रोके, विश्वविद्यालय रोके, रोजगार रोके, क्या वही बाधाएं अब अचानक रास्ता छोड़ देंगी?सैटेलाइट टाउन की बात सुनने में अच्छी लगती है। चमचमाती सड़कें, आधुनिक कॉलोनियां, बड़े बाजार, आईटी पार्क और रोजगार के अवसर। लेकिन बिहार का युवा जानता है कि उसके गांव में आज भी नौकरी के लिए ट्रेन पकड़कर दिल्ली जाना पड़ता है।
बिहार में विकास की सबसे बड़ी समस्या योजनाओं की कमी नहीं है। समस्या यह है कि यहां योजनाएं पहले पोस्टर बनती हैं, फिर प्रेस रिलीज बनती हैं, फिर फाइल बनती हैं और अंत में इतिहास बन जाती हैं।बैठक में कहा गया कि परियोजनाओं के पूरा होने से नागरिकों को बेहतर जीवन स्तर मिलेगा। यह सुनकर बिहार का आम आदमी मुस्कुराया होगा। क्योंकि उसे याद होगा कि उसके शहर में नाली, जलजमाव, ट्रैफिक, पेयजल और बिजली की समस्याएं आज भी पूरी तरह हल नहीं हुई हैं।सरकार कहती है कि यह बिहार के शहरी विकास का नया अध्याय होगा।जनता कहती है कि अध्याय लिखने से पहले पिछली किताब का हिसाब भी बता दीजिए।
11 सैटेलाइट टाउन का सपना बड़ा है। सपना देखना गलत नहीं है। लेकिन बिहार की जनता अब सपनों की घोषणा नहीं, सपनों की नींव देखना चाहती है।क्योंकि बिहार में सबसे ज्यादा निर्माण अगर किसी चीज का हुआ है, तो वह है—घोषणाओं का।और सबसे ज्यादा कमी अगर किसी चीज की है, तो वह है—घोषणाओं के पूरा होने की।
