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2014 में प्रशिक्षण, आज तक नहीं मिला न्याय: ग्रामीण चिकित्सक की पीड़ा

ग्रामीण चिकित्सकों के अधिकार, सम्मान और समायोजन की मांग को लेकर बिहार में चल रही बहस के बीच बांका जिले के राजकुमार शर्मा ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा है कि वर्षों से सेवा देने के बावजूद ग्रामीण चिकित्सकों को सिर्फ आश्वासन मिला है, लेकिन अब पहली बार सरकार के स्तर पर कुछ उम्मीद दिखाई दे रही है।

राजकुमार शर्मा, जो बांका जिले से हैं और जदयू जिला प्रकोष्ठ से भी जुड़े रहे हैं, ने बताया कि वर्ष 2014 में NIOS और स्टेट हेल्थ सोसाइटी के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। हालांकि, इस प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र उन्हें 2019-20 में प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि उस समय बांका जिले के सदर अस्पताल और कटोरिया रेफरल अस्पताल में प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया गया था।

उन्होंने कहा कि एलबी सिंह के नेतृत्व में ग्रामीण चिकित्सक ‘समायोजन स्वास्थ्यकर्ता’ के रूप में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

राजकुमार शर्मा ने कहा, “हम लोग लगातार व्यवस्था के साथ जुड़े रहे, इस उम्मीद में कि ग्रामीण चिकित्सकों के साथ न्याय होगा। लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है।”स्वास्थ्य मंत्री द्वारा सदन में ग्रामीण चिकित्सकों के लिए इस्तेमाल किए गए ‘झोलाछाप’ शब्द पर नाराजगी जताते हुए उन्होंने कहा कि यह बेहद अपमानजनक है।“हम गांवों में सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ लोगों की सेवा करते हैं। गांव में लोग हमें भरोसे के साथ देखते हैं। ऐसे में हमें अपमानित करना दुर्भाग्यपूर्ण है। हम समाज की धरोहर हैं, बोझ नहीं,” उन्होंने कहा।ग्रामीण चिकित्सकों का कहना है कि बिहार के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बीच वे वर्षों से लोगों को प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराते रहे हैं।

”उन्होंने देसी तंत्र द्वारा चलाए जा रहे ग्रामीण चिकित्सक अभियान की सराहना करते हुए कहा कि पहली बार इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया है, जिसका असर अब सरकार के संज्ञान के रूप में दिख रहा है।उन्होंने कहा, “अगर पहले भी मीडिया इसी तरह मिशन मोड में ग्रामीण चिकित्सकों के मुद्दे को उठाती, तो शायद आज हमारा भविष्य अंधकार में नहीं होता। सरकार को हमारे सम्मान और भविष्य को लेकर ठोस नीति बनानी चाहिए।

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Chief Editor Ranjeet Kumar

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