
युद्ध अब शायद टीवी का नया रियलिटी शो है।ग्राफिक्स चमकेंगे, एंकर गरजेंगे, और जनता को लगेगा कि बस रिमोट दबाते ही दुश्मन घुटने टेक देगा।जिस देश में इतिहास को समझने के बजाय नारे रटाए जाएं, वहां युद्धाभ्यास को भी देशभक्ति का प्रमाणपत्र बना देना आसान है।क्योंकि सोचने वाला नागरिक सत्ता के लिए असुविधाजनक होता है, भावुक नागरिक उपयोगी।
महामारी आई थी। विज्ञान कह रहा था—सावधानी, स्वास्थ्य ढांचा, टेस्टिंग, पारदर्शिता।लेकिन हमने क्या किया?ताली बजाई।थाली बजाई।दीया जलाया।ऐसा माहौल बनाया गया जैसे वायरस WHO की रिपोर्ट नहीं, मोहल्ले की आवाज सुनकर भाग जाएगा।फिर पीएम केयर्स में करोड़ों-अरबों का धन आया।लेकिन हिसाब पूछिए तो राष्ट्रभक्ति का थर्मामीटर आपके माथे पर रख दिया जाता है।
पुलवामा में जवान शहीद हुए। देश रोया।लेकिन लोकतंत्र में रोने के बाद सवाल भी होते हैं।इतना विस्फोटक आया कैसे?सुरक्षा चूक कहां थी?किसकी जिम्मेदारी तय हुई?या देशभक्ति का मतलब यही है कि सिर्फ मोमबत्ती जलाइए, सवाल मत पूछिए?
नोटबंदी को याद कीजिए।बताया गया—काला धन खत्म।आतंकवाद खत्म।नकली नोट खत्म।जनता लाइन में लगी रही।कई लोगों की जिंदगी लाइन में ही खत्म हो गई।फिर ₹2000 का नोट आया जैसे अर्थव्यवस्था का मसीहा हो।और फिर वही नोट ऐसे गायब हुआ जैसे रिश्तेदार शादी में खाना खाकर quietly निकल जाता है।
इतिहास कहता है कि जब भारत आज़ाद हुआ, दुनिया शीत युद्ध में थी।लेकिन भारत ने हर सुबह कैमरे के सामने छाती ठोककर “देख लेंगे” नहीं कहा।क्योंकि परिपक्व राष्ट्र शोर से नहीं, रणनीति से चलते हैं।आज समस्या यह है कि मीडिया का एक हिस्सा पत्रकार कम, युद्ध उत्सव समिति ज्यादा लगने लगा है।एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे सीमा पर वही तैनात हों और सेना सिर्फ बैकअप में हो।स्टूडियो की दहाड़ इतनी तेज कि बेरोजगारी, महंगाई, अस्पताल और शिक्षा की चीख दब जाए।
जनता ने सियार को शेर बना दिया।लेकिन वैश्विक मंच जंगल का चुनाव नहीं होता।वहां डेटा पूछा जाता है।कूटनीति पूछी जाती है।विश्वसनीयता पूछी जाती है।वहां “56 इंच” का टेप नहीं चलता।देशभक्ति कोई सरकारी लॉयल्टी टेस्ट नहीं है।देशभक्ति सवाल पूछना भी है।जवाब मांगना भी है।और यह समझना भी कि युद्ध कोई फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं, जहां बैकग्राउंड म्यूजिक के बाद हीरो जीत जाता है।