कैंसर नहीं था, जनता को बेवकूफ़ बनाया गया था: Ranjeet Kumar

पहले लोग नौकरी के लिए पढ़ाई करते थे, फिर प्रसिद्धि के लिए प्रतिभा दिखाते थे, अब वायरल होने के लिए कैंसर तक का इंतज़ाम कर लेते हैं।कुछ दिन पहले पूरा देश भावुक था। बताया गया कि लड़की कैंसर से पीड़ित है, प्रेमी ने उससे शादी कर ली।
लोग बोले—”सच्चा प्यार अभी ज़िंदा है।”कमेंट बॉक्स में प्रेम के महाकाव्य लिखे गए। कुछ लोगों ने इसे आधुनिक युग का सावित्री-सत्यवान बना दिया। यूट्यूब वालों ने थंबनेल लगा दिया—”प्यार हो तो ऐसा!”फिर दोनों महापुरुष लाइव आए और बोले—”अरे भाई, कैंसर-वैंसर कुछ नहीं था। बस रील थी।”यानि बीमारी फर्जी। कहानी फर्जी। भावनाएं फर्जी। लेकिन व्यू असली।
अब अगला सीजन शायद ऐसा आए— “किडनी बेचकर प्रेमिका को बचाया” और बाद में पता चले कि किडनी भी किराए की थी।समस्या सिर्फ झूठ बोलने की नहीं है।समस्या यह है कि कैंसर जैसी बीमारी, जिसने लाखों परिवारों को बर्बाद किया, उसे भी कंटेंट क्रिएटर्स ने रिंग लाइट और कैमरे के बीच लाकर खड़ा कर दिया।
जिस बीमारी के नाम पर लोग घर बेच देते हैं, गहने गिरवी रख देते हैं, महीनों अस्पताल के चक्कर लगाते हैं, उसी बीमारी को कुछ लोगों ने रील का प्रॉप बना दिया।अब समझिए कि सोशल मीडिया का नया पाठ्यक्रम क्या है—सच्चाई से व्यू नहीं आते। दुख बेचो।मेहनत से फॉलोअर नहीं बढ़ते। संवेदनाएं बेचो।और अगर कुछ न मिले तो कैंसर, गरीबी, मौत, अस्पताल—कुछ भी उठा लाओ।दर्शक रोएंगे, एल्गोरिदम हंसेगा और क्रिएटर बैंक बैलेंस देखेगा।
कल को कोई अपनी ही श्रद्धांजलि का पोस्टर बनाकर वायरल हो जाए और एक सप्ताह बाद लाइव आकर बोले—”दोस्तों, मैं मरा नहीं था, बस कंटेंट था”—तो हैरान मत होइएगा।क्योंकि यह वह दौर है जहां इंसान बीमार नहीं है, लेकिन व्यूज़ के लिए बीमारी का सर्टिफिकेट बनवा लेता है।और फिर लोग पूछते हैं कि समाज संवेदनहीन क्यों हो रहा है?क्योंकि जब झूठे कैंसर पर तालियां बजेंगी, तब असली कैंसर मरीज की चीख भी लोगों को स्क्रिप्ट लगने लगेगी।
