“सवालों से डरता है भावनात्मक विश्वविद्यालय के गुरु?”: Ranjeet Kumar


बिहार बड़ा अद्भुत प्रदेश है।यहाँ कभी-कभी ऐसा लगता है कि इतिहास की किताबों से ज्यादा महत्व यूट्यूब के व्यूज़ का हो गया है। किसी अध्याय का स्रोत क्या है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वीडियो पर कितने लाख व्यू हैं, यही सबसे बड़ा प्रमाणपत्र माना जाता है।
मैंने खान सर को तब देखा था जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ता था। बाद में उनकी क्लास भी देखी। कई बार लगा कि इतिहास बेचारा किसी कोने में बैठकर रो रहा होगा और कह रहा होगा—”भाई, मेरा भी कोई स्रोत पूछ लो।”लेकिन स्रोत पूछना बिहार में सबसे खतरनाक काम है।

आप पूछ दीजिए कि इतिहास कहाँ से पढ़ाया जा रहा है? आप पूछ दीजिए कि यह तथ्य किस किताब में लिखा है? आप पूछ दीजिए कि लाखों छात्रों में चयनित कितने हुए?बस उसके बाद आप छात्र नहीं रहेंगे, दुश्मन घोषित कर दिए जाएंगे।
फिर मैं 2021 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया पहुँचा। तब तक खान सर शिक्षक से ज्यादा एक भावनात्मक आंदोलन बन चुके थे। करोड़ों व्यू आते थे। लोग ऐसे खुश होते थे जैसे यूपीएससी का रिजल्ट नहीं बल्कि यूट्यूब का थंबनेल निकल गया हो।हमारे यहाँ एक नई शिक्षा नीति चुपचाप लागू हो चुकी थी।व्यू = ज्ञान, लाइक = योग्यता,सब्सक्राइबर = विद्वता और जिसने सवाल पूछ दिया, वह राष्ट्रद्रोही।
मैं बार-बार सोचता था कि अगर व्यूज़ से नौकरी मिलती तो बिहार के आधे बेरोजगार यूट्यूब देखकर आईएएस बन गए होते।लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बीपीएससी का प्रश्नपत्र व्यू देखकर नहीं बनता।यूपीएससी इंटरव्यू बोर्ड सब्सक्राइबर नहीं गिनता।और इतिहास के तथ्य लाइक बटन दबाने से नहीं बदलते।

कॉपीराइट मारकर इसी वीडियो को डिलीट किया गया था
2022-23 में पहली बार मैंने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया। वीडियो वायरल हुआ। लाखों लोगों ने देखा। फिर वीडियो गायब हो गया।लोकतंत्र भी शायद उस दिन हैरान हुआ होगा।जिस देश में प्रधानमंत्री पर मीम बनते हैं, मुख्यमंत्री पर व्यंग्य लिखे जाते हैं, मंत्री रोज़ आलोचना झेलते हैं, वहाँ एक कोचिंग संचालक पर सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध कैसे हो गया कि वीडियो ही गायब होने लगे?
मैंने कई यूट्यूबरों से कहा—”भाई, वीडियो हट रहे हैं।”उन्होंने कहा—”हम देख रहे हैं।”और वे आज तक देख ही रहे हैं।लोकतंत्र कभी-कभी बिहार में पर्यटक बनकर आता है, घूमता है और वापस चला जाता है।सबसे मज़ेदार दृश्य तब होता था जब कुछ लोग ऑफ कैमरा बोलते थे—”भाई, पढ़ाई में दिक्कत है।”लेकिन कैमरा ऑन होते ही बोलते—”सर विश्वगुरु हैं।”कैमरा बंद होते ही आलोचना।कैमरा चालू होते ही आरती।यह बिहार का नया डिजिटल आध्यात्म था।

देसी तंत्र वर्षों से एक ही सवाल पूछता रहा—लाखों छात्र पढ़ते हैं तो सफलता का अनुपात क्या है?इतिहास के स्रोत इतने कमजोर क्यों हैं?तथ्य की जगह भावना क्यों है?लेकिन इन सवालों का जवाब कम और भक्तों का गुस्सा ज्यादा मिला।दरअसल समस्या खान नहीं हैं।समस्या वह मानसिकता है जो हर व्यक्ति को भगवान बनाने लगती है।राजनीति में भगवान।शिक्षा में भगवान।यूट्यूब में भगवान।कोचिंग में भगवान।और भगवान से सवाल नहीं पूछे जाते।फिर धीरे-धीरे वही भगवान कानून, तथ्य और आलोचना से ऊपर समझा जाने लगता है।पत्रकारिता का संकट भी यही है।सवाल पूछो तो कहा जाता है—”ईर्ष्या कर रहे हो।”तथ्य मांगो तो कहा जाता है—”एजेंडा चला रहे हो।”जांच की बात करो तो कहा जाता है—”साजिश हो रही है।”मानो लोकतंत्र कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि फैन क्लब हो।

आज जो विवाद, एफआईआर, आरोप, गिरफ्तारियाँ और छापेमारी की खबरें चर्चा में हैं, उनका फैसला अदालत और जांच एजेंसियाँ करेंगी। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक बात जरूर साबित कर दी—बिहार में शिक्षा से बड़ा कारोबार भावना है।और भावना का सबसे सफल व्यापारी वही होता है जो छात्रों को विद्यार्थी कम और समर्थक ज्यादा बना दे।शिक्षक का काम सवालों से डरना नहीं होता।शिक्षक का काम सवाल पैदा करना होता है।लेकिन जब शिक्षक ब्रांड बन जाए और छात्र भक्त, तब किताबें पीछे छूट जाती हैं और पोस्टर आगे निकल जाते हैं।फिर शिक्षा नहीं चलती।भावना का फ्रेंचाइज़ी मॉडल चलता है।और बिहार ताली बजाता रहता है।
