
लखनऊ से खबर है।खबर वही है, जो हर चुनाव से पहले आती है—सर्वे।लेकिन इस बार आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, संकेत हैं।दैनिक भास्कर एप के एक बड़े सर्वे में बताया गया है कि 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में 256 सीटों पर भाजपा पहली पसंद है।और समाजवादी पार्टी… 135 सीटों पर।अब आप सोचिए…258 सीटें अभी भाजपा के पास हैं।सर्वे कहता है—256।यानी…सरकार बन रही है, लेकिन थोड़ा सा भरोसा कम हुआ है।
भाजपा को नुकसान—सिर्फ 2 सीटों का।लेकिन राजनीति में “सिर्फ” शब्द बड़ा खतरनाक होता है।उधर समाजवादी पार्टी—107 से बढ़कर 135
28 सीटों का फायदा।यानी विपक्ष…खत्म नहीं हुआ है,बस इंतज़ार कर रहा है।
सर्वे कहता है—सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा के सहयोगी दलों को।जो साथ हैं…वहीं पीछे दिख रहे हैं।सवाल है—क्या गठबंधन में भी प्रतिस्पर्धा चल रही है?
अब ज़रा इस सर्वे से बाहर आइए।क्योंकि एक सर्वे और होना चाहिए था—जो कभी नहीं आता।कितने घरों में खाना मिल रहा है?कितने बच्चों को शिक्षा मिल रही है?कितने अस्पतालों में दवा मिल रही है?कितने परिवार सच में खुशहाल हैं?इसका कोई डेटा नहीं है।कोई ग्राफिक्स नहीं है।कोई “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं है।यहां लोकतंत्र चुप है।अस्पताल में लाइन है—लेकिन कोई एग्जिट पोल नहीं है।स्कूल में बच्चे हैं—लेकिन कोई सर्वे नहीं है कि उन्होंने क्या सीखा।रसोई में चूल्हा जल रहा है या नहीं—इस पर कोई डिबेट नहीं होती।
लोकतंत्र में सीटों का सर्वे होता है।कौन जीतेगा, कौन हारेगा—इस पर घंटों चर्चा होती है।लेकिन…जनता के मुद्दों का सर्वे नहीं होता।कितनी समस्याएं थीं?कितनी हल हुईं?इसका कोई “रिजल्ट” नहीं आता। अंत में…आपसे कहा जाएगा—सब ठीक है, सीटें हमारे साथ हैं।आप पूछिए—क्या ज़िंदगी भी साथ है?आपसे कहा जाएगा—विपक्ष खत्म है।आप देखिए—क्या आपकी समस्या खत्म हुई है?
ये सीटों का सर्वे है…ज़िंदगी का नहीं।और जब तक ज़िंदगी का सर्वे नहीं होगा—तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।