📅 Friday, 28 August 2026 🌤 मुंबई
लोकप्रिय: AutoBihar

सच चाहिए या सिर्फ एक गिरफ्तारी? पहलगाम से ज्योति तक कई सवाल अनसुलझे

22 अप्रैल 2025।पहलगाम का बैसरन।पर्यटकों के बीच आतंकवादी पहुंचे और गोलियां चलीं।26 लोगों की मौत हुई। 25 पर्यटक थे और एक स्थानीय नागरिक भी मारा गया।देश ने पूछा—आतंकी आए कहां से?देश ने पूछा—इतनी खूबसूरत और संवेदनशील जगह तक वे पहुंचे कैसे?देश ने पूछा—खुफिया तंत्र को भनक क्यों नहीं लगी?और फिर देश को बताया गया कि इसका जवाब दिया जाएगा।जवाब आया—ऑपरेशन सिंदूर।

सरकार ने इसे आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी सैन्य कार्रवाई के रूप में पेश किया। देश ने सेना का समर्थन किया। सेना के पराक्रम पर सवाल नहीं है और न होना चाहिए।लेकिन लोकतंत्र में एक छोटी-सी दिक्कत है।मिसाइल चलाने के बाद सवाल खत्म नहीं होते।कुछ सवाल तो वहीं से शुरू होते हैं।

पहले सवाल को याद रखिए। पहलगाम में आतंकवादी भारत की सीमा के भीतर कैसे पहुंचे?वे कितने दिन पहले पहुंचे?किस रास्ते से आए?कहां रुके?किसने उन्हें खाना दिया?किसने स्थानीय मदद की?क्या किसी ने उन्हें हथियार या संचार सुविधा उपलब्ध कराई?और सबसे महत्वपूर्ण—इतने बड़े ऑपरेशन की तैयारी कर रहे आतंकियों को सुरक्षा और खुफिया तंत्र ने समय रहते क्यों नहीं पकड़ा?ये सवाल पाकिस्तान से नहीं, पहले अपने सिस्टम से पूछे जाने चाहिए।क्योंकि सीमा के उस पार दुश्मन है, यह तो देश जानता है।लेकिन दुश्मन सीमा पार करके अंदर तक आ गया—यह किसकी विफलता थी?

अब कहानी में ज्योति मल्होत्रा आती हैं16 मई 2025।हरियाणा के हिसार में FIR नंबर 153 दर्ज होती है।ट्रैवल ब्लॉगर ज्योति मल्होत्रा गिरफ्तार होती हैं।उन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने, संवेदनशील जानकारी साझा करने और पाकिस्तानी खुफिया तंत्र से संपर्क रखने जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं। FIR में Official Secrets Act और BNS की धाराएं लगाई गई हैं।जांच एजेंसियों के मुताबिक उनके संपर्क पाकिस्तानी नागरिकों और कथित खुफिया ऑपरेटिव्स से थे। मीडिया रिपोर्टों में पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारी एहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश का भी उल्लेख हुआ।गिरफ्तारी हुई।जांच होनी चाहिए।अगर आरोप सही हैं तो कानून के मुताबिक कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन यहीं पत्रकार का सवाल शुरू होता है ।सिर्फ ज्योति को पकड़ लेने से क्या पूरा नेटवर्क पकड़ में आ गया? एक व्यक्ति पकड़ा गया, लेकिन सिस्टम का सवाल कौन पकड़ेगा?मान लीजिए जांच में यह साबित होता है कि ज्योति ने संवेदनशील जानकारी साझा की।तो अगला सवाल होगा वह जानकारी किसके पास जाती थी?किसने उससे संपर्क किया?किसने उसे तैयार किया?किसने उसे सुरक्षित महसूस कराया?किसने उसके संपर्कों को बढ़ाया?और क्या उसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क था?क्योंकि खुफिया नेटवर्क में अक्सर सामने दिखाई देने वाला व्यक्ति पूरी कहानी नहीं होता।वह सिर्फ एक कड़ी होता है।सवाल यह है कि बाकी कड़ियां कहां हैं?

अब आइए नलिन प्रभात पर।यहां एक पुरानी घटना भी याद करनी चाहिए।6 अप्रैल 2010।दंतेवाड़ा।माओवादी हमले में 75 CRPF जवान और एक राज्य पुलिसकर्मी मारे गए।उस समय नलिन प्रभात CRPF में DIG (Operations), Dantewada थे।CRPF की Court of Inquiry और अन्य जांचों में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और ऑपरेशन की योजना को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।

Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार Court of Inquiry ने चार अधिकारियों की भूमिका में लापरवाही बताई थी और यह भी दर्ज किया कि क्षेत्र में तीन दिन का area-domination exercise प्रभात के पदभार संभालने के कुछ ही दिन बाद तय किया गया था।बाद में CRPF ने प्रभात समेत अधिकारियों को वहां से स्थानांतरित किया था। हालांकि बाद की समीक्षा में उन्हें क्लीन चिट मिलने की भी रिपोर्ट है। इसलिए इसे आज उनके खिलाफ सिद्ध अपराध की तरह पेश करना सही नहीं होगा।लेकिन सवाल बचा रहा …सुरक्षा व्यवस्था में हुई बड़ी चूक की जवाबदेही आखिर तय कैसे होती है?

2025 में फिर नलिन प्रभात22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हमला हुआ।उस समय जम्मू-कश्मीर पुलिस के DGP नलिन प्रभात थे। यानी राज्य पुलिस की सर्वोच्च कमान उनके पास थी।इसका मतलब यह नहीं कि पहलगाम हमले के लिए व्यक्तिगत रूप से DGP को दोषी घोषित कर दिया जाए।ऐसा फैसला जांच के बिना नहीं हो सकता।लेकिन क्या उनसे सवाल भी नहीं पूछा जाना चाहिए?सुरक्षा व्यवस्था कहां चूकी?इंटेलिजेंस इनपुट कहां था?स्थानीय नेटवर्क की निगरानी क्यों नहीं हुई?बैसरन जैसे पर्यटन क्षेत्र की सुरक्षा में क्या कमी थी?और अगर कहीं चूक हुई थी।उसकी जिम्मेदारी किसकी तय हुई?यही लोकतंत्र का सवाल है।

-अजीब बात देखिए…एक तरफ सरकार कहती है—पाकिस्तान आतंकवाद का स्रोत है।दूसरी तरफ एक कथित पाकिस्तानी जासूसी नेटवर्क का मामला सामने आता है।तो सवाल होना चाहिए—भारत के भीतर यह नेटवर्क कितनी दूर तक पहुंचा था?एक ट्रैवल ब्लॉगर तक?या उससे आगे भी?अगर आगे था तो कौन-कौन?और अगर नहीं था तो जांच एजेंसियां देश को स्पष्ट रूप से बताएं कि उन्होंने इसकी पूरी तह तक पहुंचकर क्या पाया क्योंकि सुरक्षा का मतलब सिर्फ गिरफ्तारियां नहीं है।सुरक्षा का मतलब है -घुसपैठ रोकना।खुफिया जानकारी जुटाना।स्लीपर नेटवर्क पहचानना।संवेदनशील स्थानों की निगरानी करना।स्थानीय मददगारों की पहचान करना।और चूक होने पर जिम्मेदारी तय करना।वरना हर बार यही होगा।पहले हमला होगा।फिर देश गुस्सा करेगा।फिर सरकार कार्रवाई बताएगी।फिर कुछ गिरफ्तारियां होंगी।

फिर टीवी स्टूडियो में राष्ट्रवाद की बहस होगी।और कुछ महीने बाद सब भूल जाएंगे कि असली सवाल क्या था।ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल करना सेना पर सवाल करना नहीं हैयह अंतर समझना बहुत जरूरी है।भारतीय सेना ने क्या किया, उसका मूल्यांकन सेना और विशेषज्ञ करेंगे।लेकिन सरकार से यह पूछना पत्रकारिता का अधिकार है कि—जिस हमले के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उस हमले को होने से रोकने में सिस्टम कहां विफल हुआ?अगर सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर को देश की सुरक्षा नीति की बड़ी उपलब्धि बताया है तो क्या उसी सरकार से यह पूछना गलत है कि पहलगाम की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा का परिणाम क्या निकला?किस अधिकारी की जवाबदेही तय हुई?किस अधिकारी पर कार्रवाई हुई?किसे हटाया गया?किसे चेतावनी दी गई?किसकी भूमिका की जांच हुई?और अगर किसी की गलती नहीं थी—तो यह भी देश को बताइए कि गलती आखिर हुई किससे?

देश को दुश्मन का नाम पता है, अब सिस्टम की चूक का नाम भी पता होना चाहिए।ज्योति मल्होत्रा पर आरोप गंभीर हैं।अदालत तय करेगी कि आरोप साबित होते हैं या नहीं।लेकिन अगर जांच में कोई बड़ा नेटवर्क निकलता है तो उसके हर हिस्से तक पहुंचना जरूरी है।और अगर कोई सरकारी या सुरक्षा अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके पद, वर्दी या प्रतिष्ठा के कारण उसे बचाया नहीं जाना चाहिए।राष्ट्रीय सुरक्षा में छोटी मछली पकड़कर बड़ी मछली को भूल जाना सुरक्षा नहीं है।और दूसरी तरफ किसी अधिकारी को केवल संदेह के आधार पर दोषी घोषित कर देना भी पत्रकारिता नहीं है।सच इन दोनों के बीच है।सवाल पूछिए।जांच होने दीजिए।सबूत सामने आने दीजिए।और फिर जिम्मेदारी तय कीजिए।

आखिर सरकार से सवाल इतना ही है। पहलगाम में 26 लोग मारे गए।परिवार उजड़ गए।देश ने बदला देखा।ऑपरेशन सिंदूर देखा।राजनीतिक भाषण सुने।राष्ट्रवाद सुना।लेकिन एक सवाल अब भी अपनी जगह खड़ा है—आतंकी भारत में पहुंचे कैसे?और उसके बाद दूसरा सवाल—अगर सुरक्षा तंत्र में कोई चूक हुई थी, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय हुई?और तीसरा सवाल—अगर पाकिस्तान का खुफिया नेटवर्क भारत के नागरिकों तक पहुंच रहा था, तो वह भारत के भीतर और कहां-कहां तक पहुंचा है?इन सवालों को पूछना देश विरोध नहीं है।यही देश के प्रति जिम्मेदारी है।क्योंकि देश सिर्फ सीमा पर खड़े जवान से सुरक्षित नहीं होता।देश एक मजबूत खुफिया तंत्र, जवाबदेह प्रशासन और ईमानदार जांच से भी सुरक्षित होता है।

और अंत में सबसे कठिन सवाल—ऑपरेशन सिंदूर की तस्वीरें देश ने देख लीं।अब पहलगाम की सुरक्षा चूक की पूरी तस्वीर कौन दिखाएगा?राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सवाल मत रोकिए।राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ही सवाल पूछिए।क्योंकि देश को सिर्फ बदले की कहानी नहीं,पूरी सच्चाई चाहिए।सच से पर्दा आखिर कौन और कब हटाएगा?

C

Chief Editor Ranjeet Kumar

लेखक

इस लेखक की और ख़बरें पढ़ने के लिए नाम पर क्लिक करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

✓ लिंक कॉपी हो गया