अदाणी पर अमेरिकी फैसला: आरोप खत्म या सवालों का भी अंतिम संस्कार?


अमेरिकी अदालत ने अदाणी के खिलाफ आपराधिक आरोप खारिज कर दिए।
बस फिर क्या था!खबरों में ऐसा लगा जैसे अदालत ने सिर्फ केस नहीं, सवालों की भी जमानत करा दी हो।

करीब दो साल पुराने मामले में आरोप लगे। जांच हुई। मामला अदालत तक पहुंचा। फिर अदालत ने आरोप खारिज कर दिए।अब मामला खत्म!क्यों?क्योंकि हमारे यहां किसी बड़े आदमी के खिलाफ आरोप लगना खबर है, लेकिन आरोप खारिज होना अक्सर चरित्र प्रमाण पत्र बन जाता है।
आम आदमी पर आरोप लगे तो वह आरोपी।बड़े आदमी पर आरोप लगे तो पहले दिन से ही “षड्यंत्र का शिकार”।और अदालत ने आरोप खारिज कर दिए तो—“सत्य की जीत!”वाह!लेकिन जरा ठहरिए।अदालत ने आपराधिक आरोप खारिज किए हैं। इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया में अदाणी से जुड़े हर सवाल पर भी ताला लग गया।मगर मीडिया को सवालों से ज्यादा सुर्खियां पसंद हैं।
आजकल पत्रकारिता का नया फॉर्मूला बड़ा आसान है —आरोप लगा → ब्रेकिंग न्यूज।आरोप खारिज हुआ → सत्य की जीत। बीच में सवाल पूछ लिया → आप देशविरोधी!और जनता?जनता से कहा जाता है—आप बस तालियां बजाइए, कानून हम आपको हेडलाइन में समझा देंगे।सबसे मजेदार बात यह है कि अदालत के फैसले को लेकर भी दो तरह की पत्रकारिता चलती है।एक तरफ फैसला आते ही विजय पताका।दूसरी तरफ वही फैसला देखकर मातम।दोनों तरफ अदालत का नाम लिया जाता है, लेकिन पढ़ा शायद किसी ने नहीं।
अदालत ने कानून के आधार पर फैसला दिया।अब पत्रकार का काम था कि वह बताए—आरोप क्या थे, अदालत ने उन्हें क्यों खारिज किया और फैसले की वास्तविक सीमा क्या है।लेकिन यह काम थोड़ा कठिन है।इसमें न नारा बनता है, न भक्त और विरोधी वाली बहस।इसलिए आसान रास्ता चुना गया—“अदाणी के खिलाफ सभी आरोप खत्म, सत्य की जीत।”साहब,
अगर हर मुकदमे में आरोप खारिज होते ही सत्य का प्रमाणपत्र मिलने लगे तो फिर अदालतों में फैसले नहीं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हुआ करें।और हां…अगर कल किसी गरीब पर कोई आरोप लगे और अदालत उसे खारिज कर दे, तो क्या मीडिया उसी उत्साह से लिखेगा—“गरीब के खिलाफ आरोप खारिज, सत्य की जीत!”शायद नहीं।क्योंकि हमारे यहां न्यायालय सबके लिए समान हो सकता है,लेकिन हेडलाइन का आकार अक्सर हैसियत देखकर तय होता है।अदाणी को अदालत से राहत मिली है—यह खबर है।लेकिन इस राहत को ऐसा चश्मा बना देना, जिससे बाकी सारे सवाल दिखाई ही न दें—यह खबर नहीं, खबर का मेकअप है।
