गरीब के लिए यही ग्रामीण चिकित्सक“AIIMS” हैं: हर पत्रकार रंजीत कुमार!

गांव में जब कोई बीमार पड़ता है, तो वह पहले संविधान नहीं देखता…वह यह भी नहीं पूछता कि इलाज करने वाला डॉक्टर एमबीबीएस है या नहीं।वह सिर्फ यह देखता है—कौन है जो अभी, इसी वक्त उसकी मदद कर सकता है।और अक्सर… वह होता है—ग्रामीण चिकित्सक।

पहली वजह: सिस्टम की अनुपस्थिति में यही व्यवस्था हैंसरकार कागज पर अस्पताल बनाती है, डॉक्टर नियुक्त करती है, योजनाएं चलाती है।लेकिन जमीन पर… ताला लटका होता है।ऐसे में गांव का एक छोटा सा क्लीनिक—जिसे शहर वाले “झोलाछाप” कह देते हैं—वह दरअसल उस खाली जगह को भर रहा होता है, जहां सिस्टम होना चाहिए था।

दूसरी वजह: इलाज नहीं, भरोसा देते हैं।आप शहर में डॉक्टर के पास जाते हैं—फीस देते हैं, नंबर का इंतजार करते हैं।गांव में मरीज सीधे दरवाजे पर पहुंचता है…और डॉक्टर भी उसे नाम से जानता है, उसके परिवार को पहचानता है।यह सिर्फ इलाज नहीं है, यह एक सामाजिक रिश्ता है—जिसे मेडिकल डिग्री से नहीं, भरोसे से बनाया जाता है।

तीसरी वजह: गरीब के लिए यही “AIIMS” हैं All India Institute of Medical Sciences जाना हर किसी के बस की बात नहीं है।न पैसे हैं, न पहुंच, न समय।ऐसे में गांव का डॉक्टर ही गरीब का एम्स है—जहां इलाज महंगा नहीं, इंसानियत सस्ती नहीं होती।

चौथी वजह: सरकार की विफलता का ठीकरा इनके सिर जब स्वास्थ्य व्यवस्था फेल होती है, तो जिम्मेदारी तय नहीं होती—बल्कि एक आसान रास्ता चुना जाता है…इन ग्रामीण चिकित्सकों को “अवैध” कहकर कार्रवाई कर दी जाती है।सवाल यह है—अगर हर गांव में डॉक्टर होते, तो क्या ये लोग होते?

पांचवीं वजह: समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा हैं इनके पास अनुभव है, जमीन की समझ है, और समाज का भरोसा है।जरूरत है इन्हें खत्म करने की नहीं…बल्कि इन्हें ट्रेनिंग देकर, नियमों में बांधकर सिस्टम में शामिल करने की।

अंत में एक सवाल गांव का आदमी जब मरता है, तो उसकी मौत की जिम्मेदारी कौन लेता है?वह ग्रामीण चिकित्सक… जो आखिरी कोशिश करता है?या वह सिस्टम… जो कभी पहुंचा ही नहीं?ग्रामीण चिकित्सकों को समर्थन देना, किसी गलत को सही ठहराना नहीं है…यह उस सच्चाई को स्वीकार करना है,जिसे सरकार अक्सर आंकड़ों में छिपा देती है।

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