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कन्हैया कुमार की कहानी किसी एक नेता की कहानी नहीं है, यह उस दौर की कहानी है जहाँ बोलने वाले धीरे-धीरे ‘समझदार’ बना दिए जाते हैं।एक समय था जब उनके भाषणों में जोखिम था—शब्दों में आग थी, और तर्क में वो बेचैनी थी जो सत्ता को असहज करती थी। वो बोलते थे तो लगता था कोई “लाइन” नहीं मान रहा, कोई तय स्क्रिप्ट नहीं पढ़ रहा।लेकिन अब वही आवाज़ जैसे किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा लगती है।फर्क बस इतना है कि पहले भाषण spontaneous होता था, अब synchronized हो गया है।
राजनीति में आना गलत नहीं, पार्टी जॉइन करना भी गलत नहीं।लेकिन सवाल यह है कि उस प्रक्रिया में कन्हैया कुमार ने क्या खोया?Indian National Congress में शामिल होना शायद एक रणनीति थी—एक बड़े मंच की तलाश।पर मंच जितना बड़ा होता है, वहां बोलने की आज़ादी उतनी ही ‘मैनेज’ की जाती है।अब कन्हैया जब बोलते हैं तो शब्दों से पहले “संतुलन” आता है।हर वाक्य जैसे पूछता है—“कहीं ये ज़्यादा तो नहीं हो गया?”जो नेता कभी “ओवर” बोलने के लिए जाना जाता था, अब “अंडर” बोलने में माहिर हो गया है।
बेगूसराय में उन्हें “शेर” कहा गया—क्योंकि वो भीड़ में अलग दिखते थे, भीड़ को प्रभावित करते थे।आज भीड़ में वो अलग नहीं दिखते, क्योंकि अब वो भीड़ के हिसाब से चलते हैं।शेर जब जंगल में होता है तो उसकी दहाड़ उसकी पहचान होती है,लेकिन जब वही शेर किसी व्यवस्था के भीतर आ जाता है, तो उसे दहाड़ने से पहले इजाज़त लेनी पड़ती है।अब कन्हैया की राजनीति में वो कच्चापन नहीं है—जो उन्हें खास बनाता था।अब सब कुछ polished है, controlled है… और कहीं न कहीं, predictable भी।नेता बनना आसान है, आवाज़ बने रहना मुश्किल विधायक या सांसद बनना एक उपलब्धि है, इसमें कोई शक नहीं।लेकिन जमीनी नेता वही होता है जिसकी बात लोगों के दिल में जगह बनाए—और जो सत्ता के सामने असहज सवाल खड़े करे।
“सवाल खत्म हो रहे हैं, इसलिए जवाब मजबूत हो रहे हैं।”कन्हैया के साथ उल्टा हुआ—सवाल कम हो गए, इसलिए उनकी पहचान भी थोड़ी धुंधली हो गई।सबसे बड़ा व्यंग्य क्या है?सबसे बड़ा व्यंग्य यह नहीं कि कन्हैया बदल गए।सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि सिस्टम ने उन्हें बदलने की जरूरत ही नहीं समझी—बस धीरे-धीरे absorb कर लिया।अब वो विरोध नहीं, विकल्प बनने की कोशिश में हैं।और इस कोशिश में उनका वो हिस्सा कहीं पीछे छूट गया है, जो उन्हें खास बनाता था।
अंत में एक असहज सवाल क्या कन्हैया कुमार आज भी वही हैं, जिनकी वजह से लोग रुककर सुनते थे?या अब वो भी उन्हीं नेताओं में शामिल हो गए हैं, जिन्हें लोग स्क्रॉल करके आगे बढ़ जाते हैं?क्योंकि आज की राजनीति में हारने से ज्यादा खतरनाक है—“नज़रअंदाज़ हो जाना।”


