
प्रोफ़ेसर साहब अपनी शिष्या को “अध्ययन” करवा रहे हैं…लेकिन सवाल ये है—क्या वाकई ये अध्ययन है?क्योंकि अध्ययन में तो किताब होती है,कॉपी होती है,और हाथ में क़लम होता है।पर यहाँ…न किताब दिख रही है,न कॉपी,न क़लम।तो फिर ये कैसा ज्ञान है?
ज्ञान या सौदा?
विश्वगुरु बनने का दावा करने वाले इस देश मेंअब ज्ञान का रास्ता बदल गया है।यहाँ मेहनत करने वाला छात्रलाइब्रेरी में घिसता रहता है,और “सिस्टम समझने वाला”सीधे शॉर्टकट पकड़ लेता है।इंटरव्यू में अच्छे मार्क्स चाहिए?तो जवाब लिखने की जरूरत नहीं—“रिश्ते” बनाने की जरूरत है।डिग्री चाहिए?तो सालों की मेहनत नहीं—कुछ “सुविधाओं” का इंतज़ाम काफी है।
शिष्या की चुप्पी—मजबूरी या महत्वाकांक्षा?
सबसे बड़ा सवाल शिष्या पर नहीं,उसकी चुप्पी पर है।वो शिष्याजो कल तक सवाल पूछती थी,व्यवस्था पर उंगली उठाती थी,आज अचानक शांत क्यों है?क्या ये उसकी मजबूरी है?या फिर उसने भी सिस्टम को समझ लिया है?क्योंकि इस व्यवस्था मेंसवाल पूछने वालों को डिग्री नहीं मिलती,और समझौता करने वालों का “भविष्य” सुरक्षित हो जाता है।
आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है—डिग्री और ज्ञान अलग-अलग रास्तों पर खड़े हैं।एक तरफ वो छात्र हैजो रात-रात भर पढ़ता है,एग्जाम देता है,फिर भी रिजल्ट का इंतज़ार करता है।और दूसरी तरफ वो है जिसे न एग्जाम की चिंता है,न पढ़ाई की—क्योंकि उसकी डिग्री पहले ही “तय” है।समाज की चुप्पी सब कुछ सबको दिख रहा है—क्लासरूम से लेकर हॉस्टल,कॉरिडोर से लेकर होटल तक।लेकिन कोई बोलता क्यों नहीं?क्योंकि डर है—कैरियर का,डिग्री का,भविष्य का।और यही डर इस पूरे खेल को जिंदा रखता है।
प्रोफ़ेसर—गुरु या शक्ति का दुरुपयोग?
गुरु का स्थान हमेशा ऊँचा माना गया—जहाँ से ज्ञान मिलता है,जहाँ से चरित्र बनता है।लेकिन जब वही गुरुअपने पद, अपनी ताकत और अपने प्रभाव का गलत इस्तेमाल करने लगे,तो वो गुरु नहीं रहता—वो एक “सिस्टम” बन जाता है।एक ऐसा सिस्टम जहाँ ज्ञान नहीं,बल्कि शोषण चलता है।डिग्री बनाम ज्ञान


